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दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का इतिहास

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दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, भाप का इंजन। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

19वीं शताब्दी के दौरान, जब तक 1879 में उत्तरी बंगाल स्टेट रेलवे ने सिलीगुड़ी तक अपना संचालन नहीं बढ़ाया था, तब तक कलकत्ता से दार्जिलिंग तक का सफर बहुत कठिन हुआ करता था।

दार्जिलिंग पहुँचने के लिए रेल, भाप नौका (स्टीम फ़ेरी), बैलगाड़ी और सड़क सहित परिवहन के विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता था। यात्रा में पाँच से छः दिन लगा करते थे। वर्षों से, हिल कार्ट रोड से यात्री अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए भारवाही टट्टटुओं, बैलों, पालकियों, टट्टू टांगों (घोड़ा-गाड़ी) और बैलगाड़ियों का उपयोग किया करते थे। इन साधनों से संबंधित समस्याओं से बचने के लिए रेलवे को एक रामबाण उपाय माना गया।दार्जिलिंग की पहाड़ियों से चाय और अन्य स्थानीय उत्पाद अब आसानी से मैदानी इलाकों में ले जाए जा सकते थे, और इसी तरह, आवश्यक वस्तुएँ, चाय बागान मशीनरी और सैनिकों को समय से पहाड़ियों में भेजा जा सकता था। हिमालय की तलहटी में स्थित, समुद्र तल से 400 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित सिलीगुड़ी, अब वह स्थान बन गया था, जहाँ सारा घाट से बिना रुके रेल यात्रा के बाद, सुबह के समय यात्री नाश्ता करते थे। वहाँ से यात्री मीटर गेज प्रणाली से उस प्रणाली में स्थानांतरित किए जाते थे जिसमें रेल की पटरियाँ केवल 2 फ़ीट की दूरी पर होती थीं और पूरी यात्रा में अब 24 घंटे से कम समय लगता था।

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1880 के दशक में दार्जिलिंग की एक सड़क। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

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1890 के दशक में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे ट्रैक। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

आगे की यात्रा दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की छोटी रेलों पर की जाती थी। रेल के छोटे स्वरूप, और खेलने वाली रेल सेट के डिब्बे से निकली मालूम पड़ने वाली उसकी पटरियों को देखकर यात्री अचंभित होते थे। अपनी अनोखी विशेषताओं के बावजूद दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, जिसे टॉय रेल के रूप में भी जाना जाता है, एक इंजीनियरिंग का अद्भुत चमत्कार था। इसे वर्ष 1871 और 1881 के बीच बनाया गया था।

टॉय रेल की उत्पत्ति हिल कार्ट रोड के निर्माण से जुड़ी हुई है, जिसे वर्ष 1839 में, दार्जिलिंग शहर के निर्माण के लिए प्रतिनियुक्त, रॉयल इंजीनियर्स के लेफ्टिनेंट नेपियर के तहत शुरू किया गया था। पहाड़ी क्षेत्र की यह पट्टी जो पहले सिक्किम साम्राज्य का हिस्सा थी, 1835. में ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गई। जैसे-जैसे हिल स्टेशन का विस्तार होता गया, पुरानी कार्ट रोड, जिसे अब ओल्ड मिलिट्री रोड के नाम से जाना जाता है, अनुपयुक्त हो गई और वर्ष 1861 में एक नई कार्ट रोड को बनाने की मंज़ूरी दे दी गई। सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग को जोड़ने वाली यह नई सड़क वह मार्ग बन गया जिससे दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे तलहटी से धीरे-धीरे रास्ता बनाते हुए अंत में दार्जिलिंग टर्मिनस तक पहुँच गई।

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दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, क्लास डी इंजन। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

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हिल कार्ट रोड के बगल में बनी दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की पटरी। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे निर्माण योजना वर्ष 1878 में पूर्वी बंगाल रेलवे के एक एजेंट सर फ़्रेंक्लिन प्रेस्टेज द्वारा तैयार की गई थी। योजना और वित्त अनुमान बंगाल सरकार को दिए गए, जिसे बंगाल के तत्कालीन उपराज्यपाल सर एशले ईडन ने वर्ष 1879 में मंजूरी दे दी। तब निर्माण हेतु एक कंपनी बनाई गई। इसके लिए 14,00,000 रुपये की राशि निर्धारित की गई। यह लाइन शायद रेलवे में निजी पहल के प्रयास के पहले उदाहरणों में से एक है। वर्ष 1879 में, प्रेस्टेज द्वारा दार्जिलिंग स्टीम ट्रैमवे कंपनी का गठन किया गया और एक संशोधित अनुबंध की शर्तों के तहत उन्हें पटरी को छोटी लाइन (2 फ़ीट / 610 मिमी) तक सीमित करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वर्ष 1881 में कंपनी का नाम बदलकर दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे कंपनी कर दिया गया और वर्ष 1948 में, नव-स्वतंत्र भारतीय राज्य द्वारा इसका संचालन संभालने के बाद यह नाम बरकरार रखा गया।

अगस्त 1880 तक इस लाइन को सिलीगुड़ी से, समुद्र तल से 4,864 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित, कुरसेओंग तक 32 मील की दूरी तय करते हुए, यात्री और माल यातायात के लिए खोला गया। 52 मील की कुल लंबाई के साथ, दार्जीलिंग बाज़ार तक पूरी लाइन जुलाई 1881 में खोली गई।

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1890 के दशक में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे ट्रैक पर एक रेलवे पुल। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

निर्माण का कुल खर्च 31,96,000 रुपये या 60.400 रुपये (प्रति मील) था। मरम्मत के लिए कारखानों की स्थापना सहित, एक सुचारू सेवा सुनिश्चित करने के लिए कंपनी द्वारा कई व्यवस्थाएँ की गई थीं। उच्च क्षमता वाले इंजनों के लाइन पर कार्य करने के लिए लाइन की ढलान में भी सुधार किया गया। ठोस लोहे की पटरियों को लकड़ी के स्लीपरों पर बिछाया गया और इंजनों का निर्माण मेसर्स शार्प, स्टीवर्ट और कंपनी ऑफ़ ग्लासगो द्वारा किया गया। इन कंपनियों ने दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के लिए दो प्रकार के इंजनों का निर्माण किया, जिनमें से एक का वज़न 12 टन था और जिसकी खड़ी ढाल और तेज़ मोड़ों और घुमावदार रास्तों पर ढुलाई क्षमता 39 टन की थी, और दूसरे का वज़न 14 टन था और जिसमें शक्तिशाली ब्रेक था जो 50 टन की रेलगाड़ी को खड़ी ढाल पर ऊपर ले जाने में सक्षम था। पहाड़ की खड़ी चढ़ाई के कारण, बहुत अधिक लागत पर, कई बदलाव करने की आवश्यकता पड़ती थी, क्योंकि खड़ी चढ़ाई पर जाने के लिए कई लूपों, स्पइरलों और रिवर्सों वाली पटरियों का निर्माण करना पड़ता था।

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वर्ष 1895 में हुडवाली ट्रॉलियों सहित दार्जिलिंग टॉय रेल। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

रेल में यात्रियों के विभिन्न वर्गों के बैठने के लिए अलग-अलग डिब्बे होते थे। प्रथम श्रेणी के यात्री डिब्बे 13 फ़ीट लंबे और 6 फ़ीट चौड़े होते थे और वे, निचली फ़र्श सहित, पटरियों से 7.5 फ़ीट ऊँचे होते थे। इन डिब्बों में 19.5 इंच के पहिये लगाए जाते थे और इन्हें दो में विभाजित किया जाता था। इन डिब्बों की आदर्श वहन क्षमता 12 यात्री और छोटे सामान की थी जिन्हें सीटों के नीचे रखा जा सकता था। हालाँकि ये गाड़ियाँ बरसात के मौसम के लिए अनुकूल थीं लेकिन उस मौसम में दर्शनीय स्थल ज़्यादतर दिख नहीं पाते थे। प्रत्येक यात्री रेलगाड़ी में खुली ट्रॉलियाँ लगी होती थीं और इनमें छः प्रथम श्रेणी के यात्री या सोलह द्वितीय श्रेणी के यात्री बैठ सकते थे। इन ट्रॉलियों में हुड और पर्दे लगे होते थे और तलहटी से ऊपर की ओर की चढ़ाई के दौरान यात्री सुंदर स्थलों का दर्शन कर सकते थे।

सामान को अलग-अलग ट्रकों में ले जाया जाता था। पूर्वी बंगाल रेलवे द्वारा " हिंट्स टू विज़िटर्स" (आगंतुकों के लिए सुझाव) नामक प्रत्रक द्वारा यात्रियों को सलाह दी जाती थी कि वे, पहाड़ियों पर अत्यधिक तापमान परिवर्तन के विरुद्ध बचाव के लिए, सिलीगुड़ी से जाने से पहले अतिरिक्त कपड़ों को साथ ले जाएँ। जून से अक्टूबर तक बारिश के महीनों के दौरान जलरोधक कपड़ों को ले जाने की विशेष रूप से सलाह दी जाती थी। यात्रियों को निर्धारित प्रस्थान समय से कम से कम आधा घंटा पहले स्टेशन पहुँचने की सलाह दी जाती थी। चढ़ते समय, दोपहर की धूप से बचने, साथ ही मैदानों का दृश्य देखने और ऑक्सीजन के घटते स्तरों के साथ-साथ पहाड़ियों के तेज़ी से बदलते दृश्यों से आने वाले चक्करों को रोकने के लिए, गाड़ी की बाईं ओर की सीट पसंद की जाती थी।

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दार्जिलिंग टॉय रेल का बॉयलर इंजन,1913। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

समय की पटरी पर

एक सदी पहले डीएचआर पर एक यात्री की यात्रा कैसी होती होगी? जिस रेल मार्ग को पहले बिछाया गया था, उसपर सिलिगुड़ी से लगभग सात मील की दूरी तक समतल ज़मीन पर यात्रा होती थी। यह रेल 700 फ़ीट लंबे लोहे के पुल से महानदी नदी को पार करती थी और फिर यात्रियों को उनकी यात्रा पर आने वाले पहले चाय बागान, पंचनाई टी गार्डन, की एक झलक दिखाई देती थी। यात्रा का पहला पड़ाव सुकना स्टेशन था जो सिलीगुड़ी से लगभग सात मील की दूरी पर है और यहाँ से पहाड़ियों की चढ़ाई शुरू होती थी। रेल घने जंगल से गुज़रती थी जहाँ कभी-कभी हाथी भी दिखाई दे जाते थे। नौवें मील पर लाइन का पहला घुमाव आता था। इस जगह को घातक माना जाता था क्योंकि निर्माण कार्य में लगे कई कामगारों ने यहाँ मलेरिया के बुखार से दम तोड़ दिया था। लाइन की एक अलग विशेषता, इसका पहला स्पाइरल या लूप, साढ़े ग्यारह मील पर पड़ता था। लूप एक अभियांत्रिकी खोज का हिस्सा था जिसके कारण रेल खड़ी ढालों को पार कर पाती थी।

बारहवें और तेरहवें मील के बीच, रेल रूंगटोंग स्टेशन पर ठंडा होने और पानी के लिए रुकती थी। यहाँ से रेल दक्षिण की ओर एक और स्पाइरल की ओर जाती थी और सुरंगनुमा मार्ग के ऊपर से गुज़रती हुई उत्तर और पूर्व की ओर सोलहवें मील पर तीसरे लूप की ओर जाती थी।

आगे बढ़ते हुए रेल साढ़े सत्रह मील पर एक "ज़िगज़ैग" अथवा कई रिवर्सों में से पहले रिवर्स पर पहुँचती थी, जो इस लाइन की एक और अनूठी विशेषता थी। इस ज़िगज़ैग विशेषता को बॉलरूम नृत्य के पीछे और आगे जाने के कदमों पर बनाया गया था और दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के मुख्य ठेकेदार हेनरी रैम्से की पत्नी लिली रैम्से द्वारा ढालों पर चढ़ने और उतरने के एक तरीके के रूप में सुझाया गया था।

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डीएचआर मार्ग पर 14वें मील पर लूप नंबर 2 का नक्शा। स्रोत : इलस्ट्रेटेड गाइड टू टूरिस्ट्स टू द दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे एंड दार्जिलिंग, 1896

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डीएचआर मार्ग पर 18वें मील पर रिवर्स नं. 1 का नक्शा। स्रोत : इलस्ट्रेटेड गाइड टू टूरिस्ट्स टू द दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे एंड दार्जिलिंग, 1896

तिंधरिया स्टेशन बीसवें मील पर पहाड़ी लाइन पर दूसरा स्टेशन था और यहाँ इंजन की दुरुस्ती के लिए कंपनी के कारख़ाने थे। वहाँ से लाइन एक और "ज़िगज़ैग" और एगनी पॉइंट पर चौथे लूप की ओर बढ़ती थी।

गयाबारी स्टेशन पर तेईसवें मील और चौबीसवें मील पर दो और "ज़िगज़ैग" पड़ते थे। पगला झोरा या "मैड टोरेंट" यात्रा के आधे रास्ते पर पड़ता था। इसके बाद लगभग 5,000 फ़ीट की ऊँचाई पर रेल कुरसेओंग शहर में रुक जाती थी। आगे बढ़ते हुए, 6,552 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित सोनादा स्टेशन अगला पड़ाव होता था। इसके बाद रेल 7,407 फ़ीट की ऊँचाई पर, सबसे ऊँचे स्टेशन, घूम, पर पहुँचती थी। वहाँ से रेल पहाड़ से नीचे की ओर दार्जिलिंग शहर की ओर जाती थी। 1919 में, घूम से दार्जिलिंग तक लगभग 140 फ़ीट नीचे जाने वाली तीव्र ढाल पर उतरने के लिए बाटासिया लूप बनवाया गया था।

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एगनी पॉइंट में लूप, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

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डीएचआर इंडेक्स नक्शा। स्रोत : इलस्ट्रेटेड गाइड टू टूरिस्ट्स टू द दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे एंड दार्जिलिंग, 1896

अंतत: रेल दार्जिलिंग टर्मिनस पर पहुँचती जिससे यात्रियों को राहत की साँस आती थी।

वर्तमान समय में डीएचआर मार्ग में बहुत अधिक बदलाव नहीं हुए हैं और इस पर्वतीय रेलवे के यात्री अभी भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही यात्रा करते हैं।

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दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के रेल स्टेशन। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स

इसलिए, यह कहा जा सकता है कि, भले ही एक सदी के दौरान दृश्यावली बहुत बदल गई हो और 2000 में एनडीएम6 इंजनों के साथ डीएचआर की डीज़ल-संचालन प्रणाली शुरू हो गई हो, परंतु यह मार्ग आज भी अतीत और वर्तमान को जोड़ने वाली एकमात्र लाइन बनी हुई है।

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दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का एनडीएम6 इंजन नं. 605। स्रोत : विकिमीडिया कॉमन्स