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खजुराहो मंदिर

भारत में 20 लाख से अधिक हिंदू मंदिर हैं। यह मंदिर भारतीय संस्कृति की विविधता और जीवन प्रणाली को दर्शाते हैं। भारत में मंदिर वास्तुकला ने हमेशा एक अंतर्निहित दृष्टि को अपनाया है। यह एक अनुभूति, ब्रह्मांड और समय का प्रतिक है। हिंदू मंदिरों के निर्मिति में कला और वास्तुकला को शिल्प शास्त्र में अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है। इसमें नागर या उत्तरी शैली, द्रविड़ या दक्षिणी शैली और वेसरा या मिश्रित शैली के तीन मुख्य प्रकार की मंदिर वास्तुकला का उल्लेख है।

नागर शैली की परिभाषित विशेषताएँ गर्भगृह, शिखर (वक्रीय बुर्ज), और मंडपा (प्रवेश द्वार) हैं। नागर शैली का विकास धीरे-धीरे हुआ क्योंकि पहले के मंदिरों में केवल एक ही शिखर था, जबकि बाद के मंदिरों का निर्माण कई शिखर के साथ किया जाने लगा और गर्भगृह को हमेशा सबसे ऊंचे बुर्ज के नीचे पाया जाने लगा।

खजुराहो के मंदिर नागर शैली के मंदिरों का एक अद्भुत उदाहरण हैं क्योंकि मंदिरों में एक गर्भगृह, एक छोटा आंतरिक-कक्ष (अंतराल), एक अनुप्रस्थ भाग (महामण्डप), अतिरिक्त सभागृह (अर्ध मंडप), एक मंडप या बीच का भाग और एक चल मार्ग (प्रदक्षिणा-पथ) जो बड़ी खिड़कियों के साथ है।

खजुराहो, अपने सुशोभनीय मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है, इन्हे चंदेला शासकों द्वारा 900 ईस्वी से 1130 ईस्वी के बीच बनाया गया था। खजुराहो और इसके मंदिरों का पहला उल्लेख अबू रेहान अल बिरूनी (1022 ईस्वी) और इब्न बतूता (1335 ईस्वी) के पुस्तकों में है। ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर 20 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए थे और 12वीं शताब्दी में यहाँ लगभग 85 मंदिर थे। समय के साथ खजुराहो में मंदिरों की संख्या घटकर आज केवल 20 हो गयी है।

चंदेला साम्राज्य का दसवीं से चौदहवीं शताब्दी तक मध्य भारत पर शासन था। चंदेलों को उनकी कला और वास्तुकला में रुचि के लिए जाना जाता था। हालाँकि वे शैव धर्म के अनुयायी थे, उनका वैष्णव और जैन धर्म के प्रति भी रुचि बताई गयी है।

मंदिरों की नक्काशी मुख्य रूप से हिंदू देवताओं और पौराणिक कथाओं के संबंध में है। स्थापत्य शैली भी हिंदू परंपराओं के अनुसार है। इनकी विभिन्न कारकों द्वारा पुष्टि कि जा सकती है। हिंदू मंदिर के निर्माण की एक प्रमुख विशेषता यह है कि मंदिर का मुख सूर्योदय की दिशा की ओर होना चाहिए। खजुराहो के सभी मंदिरों का निर्माण इसको ध्यान में रखकर किया गया है। इसके अलावा, इनकी नक्काशी हिंदू धर्म में जीवन के चार लक्ष्यों अर्थात, धर्म, काम, अर्थ, मोक्ष को दर्शाती है।

चंदेलों द्वारा बनाई गयी यह निर्मिती अपने स्थापत्य और मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध थी। चंदेलों को निष्पादन कला, संगीत और नृत्य के विभिन्न रूपों में भी गहरी रुचि थी। यह इन मंदिरों की दीवारों पर चित्रित संगीत और नृत्य के विभिन्न दृश्यों के मूर्तिकला प्रतिनिधित्व से स्पष्ट है।

खजुराहो के मंदिरों में कामुक भाव बहुत सामान्य है। चौड़े कूल्हों, भारी स्तनों और चमकदार आंखों वाली स्वर्गीय अप्सराओं की मूर्तियां आमतौर पर कंदरिया महादेव और विश्वनाथ मंदिर में पाई जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि यह मूर्तियाँ स्त्री सौंदर्य और प्रजनन क्षमता के विचार को दर्शाती हैं। मंदिरों की दीवारों पर दर्शाए गए अन्य दृश्य नरथारा (मानव जीवन चक्र) का एक भाग हैं, जो दर्शाता है कि यौन प्रसव और काम मानव जीवन का एक अनिवार्य पहलू है।

खजुराहो के मंदिरों के अध्ययन का प्रमुख केंद्र मूर्तियाँ रही है। इन मंदिरों की दीवारों में खजुराहो की सर्वोत्कृष्ट कलाकृती का दर्शन करती उस समय की कुछ सर्वश्रेष्ठ मूर्तियाँ हैं। यह मान्यता है कि मंदिर की मूर्तियों का पांच अलग-अलग प्रकार में निर्माण गया किया है:

  1. सांप्रदायिक छवियाँ
  2. परिवार, पार्श्व, अवराणा देवता
  3. अप्सराएँ और सुरसुन्दरियाँ
  4. विविध विषयों (नर्तकियों, संगीतकारों, शिष्यों और घरेलू दृश्यों) की धर्मनिरपेक्ष मूर्तियां
  5. पौराणिक जीव (व्याला, सरदुला और अन्य जानवर)

मूर्तियों और कामुक चित्रों का यह समूह दैनिक जीवन के दृश्यों को प्रतिनिधित्व करता है।

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खजुराहो के मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

इन मंदिरों के इतिहास के साथ कुछ कहानियां जुड़ी हैं। एक सिद्धांत का मानना है कि इन मंदिरों के निर्माण को शिव-शक्ति संप्रदाय के प्रसार के रूप में माना जा सकता है। अन्य सिद्धांत है कि यह मंदिर देवदासियां जो कभी मंदिर की गतिविधियों का एक प्रमुख भाग थी, उनका प्रतिनिधित्व करते हैं। खजुराहो के मंदिरों में देवदासियां बनने के लिए सबसे सुंदर महिलाओं को मगध, मालवा और राजपूताना से लाया गया था। लोगों का कहना है कि सुरसुंदरियाँ, जो मंदिरों की आंतरिक और बाहरी दीवारों पर हैं, उनको वास्तविक जीवन से लिया गया और देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ स्थापित किया गया है। एक अन्य सिद्धांत कहता है कि मूर्तियां एक सामान्य मनुष्य के जीवन-चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। निर्माण का वर्णन करने वाला कोई लिखित ग्रंथ आज न होने के कारण यह निश्चित करना कठिन है कि इनमें से कौन सा सिद्धांत योग्य है। इन सब कारणों के बावजूद, हम जानते हैं कि हमें दुनिया में सबसे अधिक अलंकृत, जटिल और सुंदर मूर्तियों के एक समूह भेट के रूप मे प्राप्त हुआ है।

खजुराहो के मंदिरों को पश्चिमी समूह, पूर्वी समूह और दक्षिणी समूह में विभाजित किया गया है।

खजुराहो के मंदिरों की वास्तुकला बहुत जटिल है। इन मंदिरों के मुख्य घटक हैं:

  1. एक संकीर्ण पूर्व-कक्ष अंतरला के साथ गर्भगृह,
  2. महा मंडप, एक बड़ा सभागृह
  3. अर्ध मंडप और मंडप, जो छोटे अतिरिक्त सभागृह हैं
  4. प्रदक्षिणा पथ, एक परिक्रमा पथ।

खजुराहो में कुछ मंदिर पंचायतन प्रकार के हैं, जिनमें चार तीर्थस्थल देवता को समर्पित हैं और बहुदा एक अन्य मंदिर मुख्य देवता के वाहन को समर्पित है।

यह माना जाता है कि खजुराहो के मंदिरों को केन नदी के पूर्वी तट से पन्ना की खदानों से मंगवाये गए हल्के रंग के रेतीले पत्थर से बनाया गया है। मंदिरों के निर्माण में लोहे की कीलकों का भी स्वतंत्र रूप से उपयोग किया गया है। कुछ अन्य छोटे मंदिर थोड़े से रेतीले पत्थर और थोड़े से ग्रेनाइट से निर्मित हैं।

पश्चिमी समूह के मंदिर

पश्चिमी समूह के मंदिर बमीठा-राजनगर मार्ग के पश्चिम में सिब-सागर के तट पर स्थित है। इनमें सात संस्करण शामिल हैं तथा वह शैव एवं वैष्णव संप्रदाय के लिए समर्पित हैं।

1) चौसठ योगिनी मंदिर

मंदिर परिसर में देवी काली की योगिनियों अर्थात महिला दासियों की संख्या से संबंधित 64 छोटी कोशिकाएँ हैं, जिन पर मंदिर का नाम रखा गया है। 64 कोशिकाओं में से किसी पर भी अब कोई चित्र नहीं रहा है। यह मंदिर सिब-सागर झील के दक्षिण पश्चिम में कम उचाई वाले चट्टान पर स्थित है। पूरी तरह से ग्रेनाइट से निर्मित तथा उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम में स्थित खजुराहो में यह एकमात्र मंदिर है। मंदिर विशाल नीव पर खड़ा है और इसमें 104 फुट लंबा और 60 फुट चौड़ा एक प्रांगन है। यह 65 कोशिकाओं से घिरा हुआ है, जिनमें से केवल 35 कोशिकाएं बची हैं। कोशिकाओं को छोटे मीनार या शिखर के साथ छत दी गई है, जिसके निचले भाग को चैत्य खिड़कियों की नकल में त्रिकोणीय आभूषणों से सजाया गया है। मंदिर की निश्चिगत आयु देखने के लिए कोई दिनांकित शिलालेख उपस्थित नहीं है।

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चौसठ योगिनी मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

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कंदरिया महादेव मंदिर। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

2) कंदरिया महादेव मंदिर

यह 10वीं शताब्दी ईस्वी का मंदिर खजुराहो में सभी मंदिरों में से सबसे बड़ा है। यह मंदिर 109 फुट ऊंचा और 60 फुट चौड़ा है। मंदिर की आंतरिक व्यवस्था हिंदू मंदिर के सामान्य निर्माण से अलग है क्योंकि इसके गर्भगृह के चारों ओर एक खुला मार्ग है, इस प्रकार मंदिर के भीतरी भाग में एक उच्च वेदी का निर्माण होता है। कंदरिया मंदिर की दीवारों पर लगभग नौ सौ छवियां पाई जाती हैं। छवियों की ऊंचाई 2.5 फुट से 3 फुट तक है। मंदिर का प्रवेश द्वार एक गोलाकार है और इसे देवताओं एवं संगीतकारों की छवियों से सजाया गया है। इसके अलावा, गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर तपस्या में मग्न योगीयों के छवियों से सुसज्जित floral फूलों की नक्काशी है। खंबों के आधार पर स्त्री आकृतियां देवी गंगा (गंगा नदी) और देवी जमुना (यमुना नदी) की हैं। देवी-देवता मगरमच्छ और कछुए जैसे अपने-अपने वाहनों के साथ हैं। गर्भगृह के अंदर भगवान शिव का प्रतीक एक संगमरमर का लिंग है। सभी प्रकार की नाज़ुक मुद्राओं में अप्सराओं की कई आकृतियाँ हैं।

3) देवी जगदंबा मंदिर

लगभग 77 फुट लंबाई और 50 फुट चौड़ाई में स्थापित यह मंदिर अब देवी जगदंबा के नाम से जाना जाता है। यह माना जाता है कि भगवान विष्णु की प्रतिमा गर्भगृह के प्रवेश द्वार के केंद्र पर होने के कारण यह मंदिर उनको समर्पित किया गया था। इसमें भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा की दाईं और बाईं ओर प्रतिमाएँ भी हैं। गर्भगृह के अंदर, वहाँ कमल के फूल पर चतुर्भुजा स्त्री प्रतिमा एक बड़ी मूर्ति है। मंदिर में देवी लक्ष्मी (भगवान विष्णु की पत्नी) की एक अन्य प्रतिमा भी है। यहां पाए गए कुछ शिलालेखों के आधार पर यह माना जाता है कि मंदिर का निर्माण दसवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ था, जिस अवधि में चंदेला शासन बड़े ज़ोर पर था।
गर्भगृह के दक्षिण में यम की एक आकृति है जबकि भगवान शिव (अष्ट भुजा और तीन सिर वाले) की एक आकृति निचले स्थान पर है।

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देवी जगदंबा मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

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चित्रगुप्त या भरतजी का मंदिर। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

4) चित्रगुप्त या भरतजी का मंदिर

इस मंदिर का मुख पूर्व की ओर है और लंबाई 75 फुट और चौड़ाई 52 फुट है। सूर्य देव (सूर्य) को समर्पित, सूर्य देव की एक आकृति गर्भगृह के अंदर, जिसमे वे उचे जूते पहने हुए और सात घोड़ों के रथ को चलाते है। आकृति की लंबाई 5 फुट की है जबकि प्रवेश द्वार पर सूर्य देव की एक और आकृति भी है। एक अन्य मूर्ति भगवान विष्णु की ग्यारह मुख वाली प्रतिमा है जो गर्भगृह के दक्षिण में मध्य स्थान पर विराजित है। केंद्र स्थान का मस्तक स्वयं भगवान विष्णु का है, जबकि शेष दस मस्तक उनके दस अवतारों के प्रतीक हैं। मंदिर पर कोई शिलालेख नहीं है इसलिए इसके निर्माण की अवधि का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

5) विश्वनाथ मंदिर

विश्वनाथ, या 'जगत के ईश,' भगवान शिव का एक और नाम है, जिन्हे यह मंदिर समर्पित है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर 90 फुट लंबा, और अंदर नंदी (बैल) पर बैठे भगवान शिव की आकृति है। अपने वाहन (हंस) पर भगवान ब्रह्मा, और अपने वाहन (गरुड) पर भगवान विष्णु (दाएं और बाएं) के प्रतिमाएं भी हैं। मंदिर के अंदर एक लिंगम है और मंडप के अंदर पत्थर की शिलाओं पर उत्कीर्ण दो संस्कृत शिलालेख हैं। बाईं ओर का बड़ा शिलालेख 1059 या 1002 ईस्वी का विक्रम संवत है। इसपर राजा नानुका से लेकर राजा धंगा तक चंदेल राजाओं की वंशावली का वर्णन है। शिलालेख के अनुसार, राजा धंगा की देखरेख में यह मंदिर बनाया गया था, जिन्होंने लिंग के अंदर पन्ना डलवाया था और इसके साथ इसे स्थापित करके भगवान शिव को समर्पित किया था।

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विश्वनाथ मंदिर। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

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लक्ष्मण मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

6) लक्ष्मण मंदिर

यह मंदिर चतुर्भुज मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, यह मंदिर लगभग 99 फूट लंबाई और चौड़ाई 46 फूट है। यह मंदिर वास्तुकला में अपने नवाचार के लिए जाना जाता है। इस के बाद ही मंदिरों की निचले भाग के चारों ओर अलंकृत पट्टे का उपयोग किया जाने लगा। इन पट्टों का उपयोग अप्सराओं की सुंदर मूर्तियों से को सजाने के लिए भी किया जाता था। मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक सुंदर तोरण है, और मंडप या गर्भ की छत को पुच्छ और छिद्रित हलकों के सरल उपकरणों से राहत मिलती है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव की प्रतिमाओं के साथ देवी लक्ष्मी का प्रतिमा अंकित है। ऐसा माना जाता है कि मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी ईस्वी सन् के आसपास हुआ था।

पश्चिमी परिसर के अंदर अन्य महत्वपूर्ण मंदिरों में लालगंज महादेव मंदिर, नंदी मंदिर, पार्वती मंदिर, महादेव मंदिर और वराह मंदिर शामिल हैं।

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नंदी मंदिर। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

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वराह मंदिर। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

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पार्वती मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

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ललगवां महादेव मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

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महादेव मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

पूर्व समूह के मंदिर

पूर्व समूह के मंदिर खजुराहो गाँव के बहुत नज़दीक स्थित हैं। इस परिसर में तीन ब्राह्मणवादी (या हिंदू) और तीन बड़े जैन मंदिर, अर्थात, घंटाई मंदिर, आदिनाथ का मंदिर और पार्श्वनाथ मंदिर शामिल हैं। हिंदू मंदिर भगवान ब्रह्मा, वामन और जावरी के हैं।

1) ब्रह्मा मंदिर

यह मान्यता है कि खजुराहो सागर के तट पर स्थित गर्भगृह के अंदर चार मुख वाली (चतुर्मुख) छवि संभवतः भगवान शिव की हो सकती है, परन्तु स्थानीय उपासकों द्वारा इसे गलती से भगवान ब्रह्मा की प्रतिमा समझा गया है। गर्भगृह के मध्य में और पश्चिम की खिड़कियों पर भगवान विष्णु की प्रतिमाएँ हैं। यह खजुराहो के उन कुछ मंदिरों में से एक है जो ग्रेनाइट और रेतीले पत्थर से निर्मित है। यह माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 9वीं के उत्तरार्ध में या 10वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुआ था।

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ब्रह्मा मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

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वामन मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

2) वामन मंदिर

यह मंदिर ब्रह्मा मंदिर के उत्तर-पूर्व की ओर स्थित है, और इस मंदिर की लगभग लंबाई 63 फुट और चौड़ाई 46 फुट है तथा यह असाधारण ऊंचे नीव पर खड़ा है। गर्भगृह के अंदर 5 फुट भगवान विष्णु के बौने भगवान वामन अवतार की एक सुंदर प्रतिमा है। इसमें विष्णु के अन्य अवतारों के चित्र भी हैं, इसकी प्रतिमा में भगवान ब्रह्मा की छवि भूमिस्पर्श-मुद्रा भाव के साथ भी है। गर्भगृह के ऊपर पंक्ति में भगवान ब्रह्मा अपनी पत्नी के साथ दक्षिण में और भगवान विष्णु अपने पत्नी के साथ उत्तर मे विराजित हुए चित्रित है। निचली पंक्ति में वराह, नरसिम्हा और वामन के चित्र हैं।

3) घंटाई मंदिर

मंदिर में द्वारमंडप के स्तंभों को सुशोभित करती श्रृंखलाओं पर लटकी घंटियों से इस मंदिर नाम पड़ा है। इसमें जैन तीर्थंकरों की 11 नग्न प्रतिमाएँ और उनकी दो यक्षिणीयों की प्रतिमाएँ हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर गरुड़ पर सवार आठ सशस्त्र जैन देवी, जिनकी हाथों मे विभिन्न हथियार है, उनकी एक छवि है। सरदल के प्रत्येक छोर में एक तीर्थंकर की आकृति है। बाईं ओर के नौ छवियां नौ ग्रहों (नवग्रह) को दर्शाती हैं। द्वारमंडप के स्तंभों को सुंदर रूप से सींगों वाले सिर (कीर्तिमुख) या 'फ़ेस ऑफ ग्लोरी’ के साथ सजाया गया है, साथ ही तपस्वियों और गंधर्वो की छवियां भी हैं। मंदिर की छत कई प्रकार के वाद्ययंत्रों पर नाचते-गाते संगीतकारों के समूहों को दर्शाती हुई पैनलों की पंक्तियों से बनी है। सरदल के ऊपर हाथी, बैल, शेर, लक्ष्मी, माला और अन्य शुभ वस्तुओं को दर्शायी गयी है, यह वह वस्तुएँ है जो जैन धर्म के संस्थापक महावीर की माँ ने उनके जन्म से पहले उनके सपने में देखी थी।

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घंटाई मंदिर। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

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पार्श्वनाथ जैन मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

4) पार्श्वनाथ जैन मंदिर

यह जैन मंदिरों में सबसे बड़ा, 69 फीट लंबा और 35 फीट चौड़ा है। यह 22वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का तीर्थ माना जाता है। मंदिर के द्वार के बाईं ओर एक नग्न पुरुष की आकृति है और दाईं ओर एक नग्न महिला की आकृति है, जिसके केंद्र में तीन बैठी हुइ महिला की प्रतिमाएँ हैं। प्रवेश द्वार के ऊपर एक दशभुजा जैन देवी हैं, जो विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों को धारण कर गरुड पर विराजमान हैं। हंस और मोर पर सवार दो अन्य देवीयां हैं जो सरदल पर स्थित हैं। मंदिर के अंदर, पार्श्वनाथ का एक छोटी बैठी हुई छवि है, जिससे इस मंदिर नाम दिया गया है। दरवाजे पर दसवीं या ग्यारहवीं शताब्दी के तीर्थयात्रियों के तीन छोटे अभिलेख हैं, जो शायद मंदिर की उत्पत्ति की तारीख है।

पूर्वीय भाग में अन्य महत्वपूर्ण मंदिर भी शामिल हैं जिसमे जावरी मंदिर, आदिनाथ मंदिर और शांतिनाथ मंदिर है।

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जावरी मंदिर I चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

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आदिनाथ मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

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शांतिनाथ मंदिर। चित्र सौजन्य - विकिमीडिया कॉमन्स

दक्षिणी समूह के मंदिर

दुलादेव और जटकारी मंदिर यह दो मंदिर दक्षिणी समूह में हैं।

1) दुलादेव मंदिर

यह मुख्य खजुराहो मंदिरों से लगभग डेढ़ मील दूर है और मूल रूप से शिव संप्रदाय को समर्पित है। 70 फुट ऊंचे और 41 फुट चौड़े इस मंदिर में पांच कक्ष हैं। इसमें चतुर्भुज गण और एक शंख से युक्त नक्काशी का एक अनूठा समूह है। यह माना जाता है कि मंदिर का निर्माण लगभग 10वीं शताब्दी ईस्वी में हुआ था।

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दुलादेव मंदिर। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

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जटकारी या चतुर्भुज मंदिर। चित्र सौजन्य -विकिमीडिया कॉमन्स

2) जटकारी या चतुर्भुज मंदिर

पश्चिम की ओर बना यह मंदिर जटकारी गाँव के पास स्थित है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है और गर्भगृह में लगभग नौ फीट ऊंचाई के देवता की एक प्रतिमा यहाँ विराजित है। भगवान विष्णु का चतुर्भुज प्रतिमा मुकुट अन्य आभूषणों से सुशोभित है। छवि का ऊपरी दाहिना हाथ अभय-मुद्रा में उठा हुआ है, और उस हथेली पर एक गोलाकार निशान है, जबकि बायाँ हाथ में कमल के डांठ और एक तार से बंधी हुई पवित्र पुस्तक है। गर्भगृह के बाहरी भागों को हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों के तीन पंक्तियों से सजाया गया है।

मंदिरों के औपचारिक रचना में, एक हजार वर्ष पहले के कारीगरों ने इस तरह सम्पूर्ण जीवन चक्र बनाया और हिंदू और जैन देवताओं के विभिन्न पहलुओं को चित्रित किया। इसके अतिरिक्त, मूर्तियां चित्रित किए गए विषयों की अद्वितीय विविधता के लिए उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा, खूबसूरती से चित्रित भावुक शरीर और भाव तरंगों और सुरसुंदरियों . के आभूषणों का चित्रण अद्वितीय हैं। इस तरह, खजुराहो के मंदिर संभवत: प्रारम्भिक काल में हमारे देश की कलाओं में सबसे अधिक मानवतावादी प्रतिनिधित्व करते हैं।

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इलाहाबाद संग्रहालय, खजुराहो से उपासक। चित्र सौजन्य- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण